यीशु ने उस से कहा; यह भी लिखा है, कि तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर(मत्ती 4:7)।
प्रभु यीशु का जीवन हमें स्पष्ट रूप से दिखाता है कि शैतान का सामना कैसे किया जाना चाहिए। जब जंगल में शैतान ने उसकी परीक्षा ली, तो उसने उसे ऐसे काम करने के लिए उकसाने की कोशिश की जो परमेश्वर के वचन के विपरीत था। एक समय उसने संसार के सारे राज्य उसे देने का भी प्रस्ताव रखा, ताकि उसे परमेश्वर की योजना से भटका सके। परन्तु हर बार जब शैतान ने कोई तर्क प्रस्तुत किया, तब प्रभु यीशु ने परमेश्वर के वचन से उत्तर दिया। उसने भावनाओं, विचारों या मानवीय तर्कों से बहस नहीं की—उसने पवित्रशास्त्र से उत्तर दिया। अंत में जब शैतान के सारे प्रयास समाप्त हो गए, तो वह उसे छोड़कर चला गया।
यह उदाहरण विश्वासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। शत्रु अक्सर विचारों, सुझावों और भावनात्मक दबाव के माध्यम से आता है। वह आपको यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर सकता है कि आप कमजोर है, निराश है या पराजित है। लेकिन आपको याद रखना चाहिए कि आप मसीह में कौन है। आप परमेश्वर की संतान है, हर एक आत्मिक आशीष से आशीषित है, और परमेश्वर की आत्मा आपके भीतर वास करता है (संदर्भ: इफिसियों 1:3)।
जब ऐसे विचार आएँ, तो वही करे जो प्रभु यीशु ने किया—तुरंत परमेश्वर के वचन से उनका सामना करे। यदि निराशा आए, तो परमेश्वर के प्रतिज्ञाओं को बोलें। यदि क्रोध उभरे, तो परमेश्वर की बुद्धिमत्ता को बोले। यदि शत्रु असफलता का सुझाव दे, तो मसीह में अपनी विजय की घोषणा करें। परमेश्वर का वचन आपका अधिकार है।
प्रार्थना:
प्रिय स्वर्गीय पिता, मैं घोषणा करता हूँ कि मैं आपके वचन पर दृढ़ता से खड़ा हूँ और शैतान के हर तर्क को अस्वीकार करता हूँ। मैं हर उस विचार को पहचानता हूँ जो आपकी सच्चाई के विरोध में है, और मैं तुरंत आपके वचन से उसका सामना करता हूँ। मैं घोषणा करता हूँ कि मैं मसीह में आशीषित हूँ, आपकी आत्मा से सामर्थी हूँ, और सत्य में स्थिर हूँ। मैं आपके वचन को साहस के साथ बोलता हूँ, और शत्रु का हर झूठ मेरे जीवन पर अपना प्रभाव खो देता है। यीशु के नाम में, आमीन।