दृढ़ धारणाएं को विकसित करें

कि तू यह जान ले, कि वे बातें जिनकी तू ने शिक्षा पाई है, कैसी अटल हैं। (लूका 1:4) आत्मिक परिपक्वता की एक पहचान यह है कि व्यक्ति की धारणाएं परमेश्वर के वचन पर दृढ़ता से आधारित हों। धारणा केवल एक राय नहीं है। राय परिस्थितियों के साथ बदल सकती है, परन्तु विश्वास स्थिर रहता […]
प्रभु यीशु के राज में जीवन जीना

क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध के कराण मृत्यु ने उस एक ही के द्वारा राज किया, तो जो लोग अनुग्रह और धर्म रूपी वरदान बहुतायत से पाते हैं वे एक मनुष्य के, अर्थात यीशु मसीह के द्वारा अवश्य ही अनन्त जीवन में राज करेंगे। (रोमियों 5:17) मानव इतिहास को अलग-अलग राज के रूप में […]
प्रभु यीशु आपकी हर आवश्यकता से बढ़कर है

क्योंकि पिता की प्रसन्नता इसी में है कि उस में सारी परिपूर्णता वास करे(कुलुस्सियों 1:19)। प्रभु यीशु आपके लिए पर्याप्त से भी बढ़कर है—आपकी हर आवश्यकता से कही अधिक। आपका अतीत, आपकी गलतियाँ या आपकी वर्तमान परिस्थितियाँ उसे सीमित नही करती। आपकी आवश्यकताएँ उसे परिभाषित नहीं करतीं; उसकी संपूर्णता आपके जीवन को परिभाषित करती है। […]