अब जो ऐसा सामर्थी है, कि हमारी बिनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकता है, उस सामर्थ के अनुसार जो हम में कार्य करता है। (इफिसियों 3:20)
एक ऐसी सीमित सोच है जो दुश्मन परमेश्वर के लोगों के मन में डालता है, “शायद मैं यहीं तक जा सकता हूँ?” ऐसे विचार शुरू में हानिरहित लग सकते हैं, लेकिन यदि उन्हें रोका न जाए, तो वे हमारे जीवन जीने के तरीके को आकार देने लगते हैं। परमेश्वर ने कभी नहीं चाहा कि उसकी संतान डर, संदेह या सीमित सोच के बंधन में जीवन बिताएँ। उसकी इच्छा है कि हम जीवन को अपनी परिस्थितियों की सीमाओं से नहीं, बल्कि उसके वचन के प्रकाश में देखें।
दुश्मन की सबसे बड़ी रणनीतियों में से एक यह है की वह विश्वासियों को अपनी उम्मीदें कम करने के लिए मनाए। यदि वह आपको यह विश्वास दिला दे कि परमेश्वर का सर्वोत्तम आपके लिए प्राप्त करना संभव नहीं है, तो वह पहले ही आपके विश्वास को कमजोर कर चुका है। लेकिन परमेश्वर का वचन एक बिल्कुल अलग ही तस्वीर पेश करता है। हमारा परमेश्वर उससे कहीं ज़्यादा कर सकता है जितना हम मांग सकते हैं, सोच सकते हैं या सपने में भी देख सकते हैं। उसके संसाधन असीमित हैं और उसकी क्षमता की कोई सीमा नहीं है।
इसी कारण हमें निरंतर परमेश्वर के वचन के द्वारा अपने मन को नया बनाना चाहिए (संदर्भ: रोमियों 12:2)। जैसे-जैसे आपकी सोच बदलती है, आपकी अपेक्षाएँ भी बदलने लगती हैं। आप सिर्फ़ जीवित रहने की उम्मीद करना छोड़ देते हैं, बल्कि उन्नति और फलवन्त जीवन की अपेक्षा करने लगते हैं। आप बाधाओं को स्थायी रुकावटों के रूप में नहीं देखते, बल्कि उन्हें ऐसे अवसरों के रूप में देखते हैं जिनके द्वारा परमेश्वर अपनी सामर्थ और विश्वसनीयता को आपके जीवन में प्रकट कर सकता है।
सीमित सोच के साथ जीने से इनकार करें। परमेश्वर के वचन को अपनी सोच का दायरा बढ़ाने और उस पर आपके आत्मविश्वास को मजबूत करने दें। जिसने आपको बुलाया है, उसने पहले ही वह सब कुछ तैयार कर दिया है जिसकी आपको उसके उद्देश्य को पूरा करने के लिए आवश्यकता है। उस पर विश्वास बनाए रखें, विश्वास के साथ आगे बढ़ते रहें और देखें कि वह आपके अंदर और आपके ज़रिए आपकी कल्पना से कहीं बढ़कर कार्य करता है।
प्रार्थना:
प्रिय पिता, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ क्योंकि आप असीम संभावनाओं के परमेश्वर है। आपके वचन के द्वारा मेरे मन को नया करने और मुझे आपकी सच्चाई के अनुसार सोचने की शिक्षा देने के लिए धन्यवाद। मैं आनन्दित हूँ क्योंकि आप मुझमें सामर्थी रूप से कार्य कर रहे है और मेरी माँग तथा कल्पना से कहीं अधिक बढ़कर कार्य कर रहे है। मेरा हृदय विश्वास, आशा और आपमें आत्म‑विश्वास से भरा हुआ है। यीशु के नाम में। आमीन।